राज्यसभा में शुक्रवार को भारत छोड़ो आंदोलन की 84वीं वर्षगांठ के अवसर पर देश के स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। सभापति सीपी राधाकृष्णन ने इस ऐतिहासिक आंदोलन को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक मोड़ बताते हुए कहा कि इसने देश की आजादी की लड़ाई को नई दिशा और गति प्रदान की।
सदन की कार्यवाही शुरू होने पर सभापति ने कहा कि अगस्त 1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुए भारत छोड़ो आंदोलन ने पूरे देश को स्वतंत्रता के साझा लक्ष्य के लिए एकजुट किया। उन्होंने कहा कि गांधीजी के ‘करो या मरो’ के आह्वान ने जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की सभी सीमाओं से ऊपर उठकर लाखों भारतीयों को आजादी की लड़ाई में शामिल होने की प्रेरणा दी।
उन्होंने कहा कि इस आंदोलन ने स्वतंत्रता संग्राम को जन-जन का आंदोलन बना दिया। अंग्रेजी शासन के दमन, गिरफ्तारियों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद स्वतंत्रता सेनानियों ने अदम्य साहस, अटूट संकल्प और राष्ट्र के प्रति समर्पण का परिचय दिया। उनके त्याग और बलिदान ने राष्ट्रीय आंदोलन को मजबूत किया और अंततः वर्ष 1947 में भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया।
सभापति सीपी राधाकृष्णन ने कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ केवल इतिहास को स्मरण करने का अवसर नहीं है, बल्कि उन महान स्वतंत्रता सेनानियों के आदर्शों को अपनाने का भी समय है, जिन्होंने मातृभूमि की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
उन्होंने कहा कि देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता, त्याग और राष्ट्रसेवा के उनके आदर्श आज भी सशक्त, समृद्ध और समावेशी भारत के निर्माण के लिए प्रेरणा प्रदान करते हैं। उन्होंने सभी सदस्यों से स्वतंत्रता संग्राम के अमर बलिदानियों और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने वाले वीरों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का आह्वान किया।
इसके बाद सभापति सहित सदन के सभी सदस्य अपने स्थान पर खड़े हुए और स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों एवं वीर सेनानियों की स्मृति में कुछ समय का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर सदन में राष्ट्रभक्ति और स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सम्मान का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
