ब्रिक्स संस्कृति सम्मेलन में तीन विशेष प्रदर्शनियां बनीं आकर्षण का केंद्र

‘प्रोजेक्ट मौसम’, ‘बृहत्तर भारत’ और ‘ज्ञान भारतम्’ के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक विरासत का हो रहा प्रदर्शन
7 एवं 9 अगस्त को नागरिकों के लिए खुली रहेंगी प्रदर्शनियां, सांस्कृतिक विरासत और ज्ञान परंपरा का मिलेगा प्रत्यक्ष अनुभव

5 अगस्त 2026। ब्रिक्स संस्कृति सम्मेलन का आयोजन भोपाल स्थित कुशाभाऊ ठाकरे अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में 5 से 8 अगस्त तक किया जा रहा है। सम्मेलन में भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, समुद्री सभ्यता, ज्ञान परंपरा और ब्रिक्स देशों के साझा सांस्कृतिक संबंधों को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से ‘प्रोजेक्ट मौसम’, ‘बृहत्तर भारत’ और ‘ज्ञान भारतम्’ विषयक तीन विशेष प्रदर्शनियां आयोजित की गई हैं। प्रदर्शनियां प्रतिनिधियों एवं आगंतुकों के लिए प्रमुख आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। इनसे भारत की समुद्री विरासत, ज्ञान परंपरा और वैश्विक सांस्कृतिक सहयोग को प्रभावी ढंग से प्रदर्शित किया जा रहा है। प्रदर्शनियां 7 एवं 9 अगस्त को नागरिकों के लिए भी खुली रहेंगी, जहां नागरिक भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, वैश्विक सांस्कृतिक विविधता और ज्ञान परंपरा का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त कर सकेंगे।

प्रोजेक्ट मौसम : साझा समुद्री विरासत को पुनर्जीवित करने की पहल
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) एवं केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय के लिए ‘डिजाइन फैक्टरी इंडिया’ द्वारा विकसित ‘प्रोजेक्ट मौसम’ प्रदर्शनी आगंतुकों को मानसूनी हवाओं से आकार लेने वाली साझा समुद्री विरासत और हिंद महासागर क्षेत्र में दो सहस्राब्दियों से अधिक समय से विकसित सांस्कृतिक संबंधों की ऐतिहासिक यात्रा से परिचित कराती है।
‘प्रोजेक्ट मौसम’ संस्कृति मंत्रालय की एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसका उद्देश्य साझा सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और समुद्री विरासत से हिंद महासागर क्षेत्र से जुड़े देशों के बीच प्राचीन संबंधों को पुनर्जीवित करना है। शोध, संरक्षण, दस्तावेजीकरण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से यह परियोजना सदियों पुराने सांस्कृतिक संपर्कों को सुदृढ़ बनाने और अंतर-सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा दे रही है।

प्रदर्शनी में यूनेस्को के लिए बहुराष्ट्रीय विश्व धरोहर नामांकन की अवधारणा को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है। इसमें ऐतिहासिक व्यापारिक मार्गों, तटीय बस्तियों, धार्मिक नेटवर्क और सांस्कृतिक परिदृश्यों को साझा वैश्विक विरासत के रूप में संरक्षित किए जाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है।
प्रदर्शनी की शुरुआत एक इमर्सिव फिल्म से होती है, जो मानसूनी हवाओं के प्रभाव से विकसित समुद्री व्यापार मार्गों और हिंद महासागर क्षेत्र में हुए सांस्कृतिक आदान-प्रदान की कहानी प्रस्तुत करती है। ‘सेल विद द मॉनसून’ गतिविधि में आगंतुक ओरिगामी कला से नाव बनाकर उस पर साझा विरासत से जुड़े अपने विचार अंकित करते हैं। वहीं ‘डिस्कवर शेयर्ड हेरिटेज’ डिजिटल इंटरैक्टिव से भारत और हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के साझा विरासत स्थलों की जानकारी प्राप्त करते हैं।

व्याख्यात्मक ग्राफिक्स पैनलों में व्यापार, धर्म, प्रवासन और ज्ञान के आदान-प्रदान को आकर्षक ढंग से दर्शाया गया है। वहीं एक विशेष रोडमैप से विरासत स्थलों की पहचान, जीआईएस आधारित दस्तावेजीकरण, क्षेत्रीय अनुसंधान, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, यूनेस्को नामांकन, क्षमता निर्माण, संरक्षण प्रशिक्षण तथा डिजिटल अभिलेखागार की पूरी प्रक्रिया को सरल भाषा में समझाया गया है।

‘बृहत्तर भारत’ : दुनिया के साथ भारत के सांस्कृतिक संबंधों की जीवंत झलक
‘बृहत्तर भारत’ प्रदर्शनी दुनिया के साथ भारत के सांस्कृतिक संबंध और साझा अमूर्त विरासत’ प्रदर्शनी भारत और विश्व के बीच हजारों वर्षों से चले आ रहे सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, बौद्धिक और कलात्मक संबंधों को रेखांकित करती है। प्रदर्शनी बताती है कि आधुनिक राजनीतिक सीमाओं के बनने से बहुत पहले भारत व्यापारियों, बौद्ध भिक्षुओं, विद्वानों, कलाकारों और यात्रियों के माध्यम से एशिया, अफ्रीका और विश्व के अनेक देशों से जुड़ा हुआ था। यह प्रदर्शनी स्पष्ट करती है कि ‘बृहत्तर भारत’ किसी राजनीतिक विस्तार की अवधारणा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद, ज्ञान के आदान-प्रदान और साझा मानवीय मूल्यों का प्रतीक है।

प्रदर्शनी में सम्राट अशोक द्वारा सुवर्णभूमि में बौद्ध धर्म के प्रचार, इंडोनेशिया के कुटई अभिलेख और मलिक अंबर जैसे ऐतिहासिक उदाहरणों से भारत और विश्व के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंधों को प्रस्तुत किया गया है। साथ ही इंडोनेशिया के प्रंबनन मंदिर, वायांग कुलित परंपरा, वियतनाम के बालामोन चाम समुदाय, थाईलैंड की वैदिक परंपरा तथा सिल्क रोड से हुए सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी प्रदर्शित किया गया है।

नालंदा ताम्रपत्र, प्राचीन शिलालेखों और पांडुलिपियों के माध्यम से साझा इतिहास के प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं। मलेशिया की जावी लिपि में लिखित ‘हिकायत सेरी राम’ तथा इंडोनेशिया के शासक बालपुत्रदेव द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय में विहार निर्माण जैसे उदाहरण भारत के गहरे सांस्कृतिक प्रभाव को दर्शाते हैं।
संगीत, नृत्य और स्थापत्य से जुड़े उदाहरण भी प्रदर्शनी का प्रमुख आकर्षण हैं। चीन का पीपा, भारत की वीणा, उज़्बेकिस्तान के रबाब से विकसित सरोद, थाईलैंड का खोन नृत्य, वियतनाम का चाम अप्सरा नृत्य, बोरोबुदुर, माई सन मंदिर, ताजमहल तथा हुमायूं का मकबरा साझा सांस्कृतिक विरासत की समृद्ध परंपरा को रेखांकित करते हैं।

प्रदर्शनी ‘वसुधैव कुटुम्बकम् – एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ के भारतीय दर्शन को सशक्त रूप से प्रस्तुत करते हुए संस्कृति को विश्व को जोड़ने का प्रभावी माध्यम बताती है।

‘ज्ञान भारतम’ भारतीय ज्ञान परंपरा और पांडुलिपि विरासत का डिजिटल संरक्षण
‘ज्ञान भारतम्’ केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय की एक प्रमुख राष्ट्रीय पहल है, जिसका उद्देश्य देशभर में उपलब्ध प्राचीन पांडुलिपियों का सर्वेक्षण, वैज्ञानिक संरक्षण, एआई आधारित डिजिटलीकरण तथा वैश्विक स्तर पर उनके अध्ययन और प्रसार को बढ़ावा देना है। इस परियोजना के अंतर्गत अब तक 1.19 करोड़ से अधिक पांडुलिपियों का दस्तावेजीकरण किया जा चुका है। प्रदर्शनी में डिजिटल डिस्प्ले और इंटरैक्टिव माध्यमों से भारतीय ज्ञान परंपरा, पांडुलिपियों के संरक्षण और आधुनिक तकनीक के उपयोग की जानकारी दी जा रही है। आगंतुक यहां गणित, दर्शन, साहित्य, अध्यात्म और वैदिक ज्ञान से जुड़ी दुर्लभ पांडुलिपियों का अवलोकन कर रहे हैं।

प्रमुख आकर्षणों में 16वीं शताब्दी की ‘लीलावती’, 18वीं शताब्दी की ‘रेखागणित’, सिलिकॉन वेफर पर संरक्षित ‘श्रीमद्भगवद्गीता’, ‘श्री कालिका कवचम्’, सचित्र ‘श्रीमद्भगवद्गीता’, ‘सर्वदेव दर्शन स्तोत्र’, 15वीं शताब्दी की ‘पंचतंत्र’ और महर्षि यास्क रचित ‘निरुक्त’ शामिल हैं। ये पांडुलिपियां भारतीय गणित, दर्शन, साहित्य, भाषा-विज्ञान और आध्यात्मिक परंपरा की समृद्ध विरासत को सजीव रूप में प्रस्तुत करती हैं।

मध्यप्रदेश पवेलियन में प्रदेश की पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत का आकर्षक प्रदर्शन
ब्रिक्स सम्मेलन में मध्यप्रदेश का विशेष पवेलियन भी देश-विदेश से आए प्रतिनिधियों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यूनेस्को विश्व धरोहर सांची स्तूप के मुख्य तोरण द्वार की प्रतिकृति पर आधारित इस पवेलियन में प्रदेश की प्राकृतिक, सांस्कृतिक और पर्यटन विरासत को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है। पवेलियन विदेशी प्रतिनिधियों को मध्यप्रदेश की पर्यटन क्षमता और सांस्कृतिक विविधता से भी परिचित करा रहा है।

पवेलियन में प्रदेश के प्रमुख टाइगर रिजर्व, राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, जलप्रपात और इको-टूरिज्म स्थलों के साथ खजुराहो, सांची, भीमबेटका, मांडू, ग्वालियर, ओरछा और महेश्वर जैसे ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्थलों को आकर्षक ढंग से प्रदर्शित किया गया है। आधुनिक विजुअल डिस्प्ले, प्रचार सामग्री और पर्यटन साहित्य के माध्यम से आगंतुकों को मध्यप्रदेश के वन्यजीवन, विरासत, आध्यात्मिक, ग्रामीण, साहसिक एवं अनुभवात्मक पर्यटन की विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है।

पवेलियन में संगीत, मृदा शिल्प, गोंड चित्रकला और नंदना ब्लॉक प्रिंटिंग जैसी पारंपरिक कलाओं का भी प्रदर्शन किया गया है। कलाकार राहुल श्रीवास, लक्ष्मीनारायण प्रजापति, आकाश कुमार, जयंती कुशराम, विनोद मालेवार और नंदकुमार साहू अपनी-अपनी कला के माध्यम से मध्यप्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं। वहीं ‘विंध्य वैली’ ब्रांड के अंतर्गत स्व-सहायता समूहों, किसानों एवं स्थानीय उत्पादकों द्वारा निर्मित उत्पाद भी प्रदर्शित किए गए हैं।

भारत की सांस्कृतिक विरासत का वैश्विक मंच पर प्रभावी प्रदर्शन
ब्रिक्स संस्कृति सम्मेलन में आयोजित ‘प्रोजेक्ट मौसम’, ‘बृहत्तर भारत’ और ‘ज्ञान भारतम्’ प्रदर्शनियां भारत की समुद्री विरासत, ज्ञान परंपरा और साझा सांस्कृतिक धरोहर को वैश्विक मंच पर प्रभावी रूप से प्रस्तुत कर रही हैं। वहीं मध्यप्रदेश पवेलियन प्रदेश की पर्यटन क्षमता, सांस्कृतिक विरासत, लोक एवं जनजातीय कला तथा स्थानीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ये प्रदर्शनियां ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भारतीय अवधारणा को साकार करते हुए ब्रिक्स देशों के बीच सांस्कृतिक सहयोग और आपसी समझ को नई मजबूती प्रदान कर रही हैं।

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